अध्याय 5: मुद्रण संस्कृति और आधुनिक दुनिया
Table of Contents
Toggleमुद्रण के पूर्वी एशिया से शुरू होकर यूरोप और भारत में फैलने का अपना ही एक इतिहास है। हम मुद्रण तकनीक के प्रसार और प्रभाव को सामाजिक जीवन में आए बदलाव से जोड़कर समझ सकते हैं।
शुरूआती छपी किताबें
मुद्रण (हाथ से छपाई) की सबसे पहली तकनीक चीन, जापान और कोरिया में विकसित हुई। लगभग 594 ई. से चीन में स्याही लगे काठ के ब्लॉक या तख़्ती पर काग़ज़ को रगड़कर किताबें छापी जाने लगी थीं।
- पतले, छिद्रित काग़ज़ के दोनों तरफ़ छपाई संभव न होने के कारण पारंपरिक चीनी किताब “एकॉर्डियन” शैली में, किनारों को मोड़ के सिल कर बनाई जाती थी।
- किताबों का सुलेखन या ख़ुशनवीसी करनेवाले लोग दक्ष सुलेखक या ख़ुशख़त होते थे, जो हाथ से बड़े सुंदर-सुडौल अक्षरों में सही-सही कलात्मक लिखाई करते थे।
➡ एक लंबे अरसे तक मुद्रित सामग्री का सबसे बड़ा उत्पादक चीनी राजतंत्र था। सिविल सेवा परीक्षा से नियुक्त चीन की नौकरशाही भी विशालकाय थी। वह परीक्षाओं के लिए बड़ी तादाद में किताबें छपवाता था।
- 16वीं सदी में परीक्षा देने वालों की तादाद के साथ छपी किताबों की मात्रा भी बढ़ गई।
- 17वीं सदी तक आते-आते चीन में शहरी संस्कृति के फलने-फूलने से छपाई के इस्तेमाल में भी विविधता आई।
- अब मुद्रित सामग्री का उपयोग विद्वान और अधिकारी के साथ व्यापारी भी करने लगे।
- पढ़ना एक शग़ल (शौक) भी बन गया।
- नए पाठक वर्ग को काल्पनिक क़िस्से, कविताएँ, आत्मकथाएँ, शास्त्रीय साहित्यिक कृतियों के संकलन और रूमानी नाटक पसंद थे।
- अमीर महिलाओं ने भी पढ़ना शुरू किया और कुछ ने स्वरचित काव्य और नाटक भी छापे।
19वीं सदी के अंत में पश्चिमी शक्तियों द्वारा अपनी चौकियाँ स्थापित करने के साथ पश्चिमी मुद्रण तकनीक और मशीनी प्रेस भी आई। पश्चिमी शैली के स्कूलों की ज़रूरतों को पूरा करने वाला शंघाई प्रिंट-संस्कृति का नया केंद्र बन गया। अब हाथ की छपाई की जगह मशीनी या यांत्रिक छपाई ने ले ली।
जापान में मुद्रण
चीनी बौद्ध प्रचारक 768-770 ई. के आसपास छपाई की तकनीक लेकर जापान आए। 868 ई. में जापान की सबसे पुरानी पुस्तक “डायमंड सूत्र” छपी। जिसमें पाठ के साथ-साथ काठ पर खुदे चित्र हैं।
- तसवीरें अकसर कपड़ों, ताश के पत्तों और काग़ज़ के नोटों पर बनाई जाती थीं।
- मध्यकालीन जापान में कवि के साथ-साथ गद्यकार भी छपते थे और किताबें सस्ती और सुलभ थीं।
➡ 18वीं सदी के अंत में, एदो (तोक्यो) के शहरी इलाक़े की चित्रकारी में शालीन शहरी संस्कृति दिखती है। जिसमें हम चायघर के मजमों, कलाकारों, और तवायफ़ों को देख सकते हैं। हाथ से मुद्रित तरह-तरह की सामग्री (महिलाओं, संगीत के साज़ों, हिसाब-किताब, चाय अनुष्ठान, फूलसाज़ी, शिष्टाचार और रसोई पर लिखी किताबों) से पुस्तकालय एवं दुकानें अटी पड़ी थीं।
यूरोप में मुद्रण का आना
सदियों तक चीन से रेशम और मसाले रेशम मार्ग से यूरोप आते रहे थे। 11वीं सदी में चीनी काग़ज़ भी उसी रास्ते वहाँ पहुँचा।
- काग़ज़ ने कातिबों या मुंशियों द्वारा लिखी गई पांडुलिपियों के उत्पादन को मुमकिन बना दिया।
- 1295 ई. में मार्को पोलो (खोजी यात्री) चीन से छपाई की तकनीक का ज्ञान लेकर इटली वापस लौटा।
इस प्रकार इतालवी भी तख़्ती की छपाई से किताबें निकालने लगे और जल्द ही यह तकनीक बाक़ी यूरोप में फैल गई।
➡ मुद्रित किताबों को सस्ती, अश्लील मानने वाले कुलीन वर्गों और भिक्षु-संघों के लिए बेशक़ीमती वेलम या चर्म-पत्र पर ही किताबें छपते थे। व्यापारी और विश्वविद्यालय के विद्यार्थी सस्ती मुद्रित किताबें खरीदते थे।
- किताबों की माँग बढ़ने के साथ-साथ यूरोप-भर के पुस्तक विक्रेता विभिन्न देशों में निर्यात करने लगे।
- अलग-अलग जगह पर पुस्तक मेले लगने लगे।
- अब अमीर लोगों के साथ-साथ सुलेखक या कातिब को पुस्तक-विक्रेता भी रोज़गार देने लगे।
किताबों की बढ़ती माँग हस्तलिखित पांडुलिपियों से पूरी न होने कारण:
- नक़ल उतारना बेहद ख़र्चीला, समयसाध्य और श्रमसाध्य काम था।
- नाज़ुक पांडुलिपियों को लाने-ले जाने, रख-रखाव में तमाम मुश्किलें थीं।
- इसलिए किताबों की बढ़ती माँग पर वुडब्लॉक प्रिंटिंग (तख़्ती की छपाई) लोकप्रिय होती गई।
➡ 15वीं सदी की शुरुआत तक यूरोप में बड़े पैमाने पर तख़्ती छपाई का इस्तेमाल करके कपड़े, ताश के पत्ते, और छोटे-छोटे टिप्पणियों के साथ धार्मिक चित्र जा रहे थे। अब किताबों को छापने के लिए तेज़ और सस्ती मुद्रण तकनीक की ज़रूरत थी।
गुटेनबर्ग और प्रिंटिंग प्रेस
गुटेनबर्ग के पिता व्यापारी थे, और वह खेती की एक बड़ी रियायत में पल-बढ़कर बढ़ा हुआ। बचपन से ही तेल और जैतून पेरने की मशीनें देखता आया था।
- बाद में उसने पत्थर यह पॉलिश करने की कला सीखी, फिर सुनारी और अंत में उसने शीशे को इच्छित आकृतियों में गढ़ना सीखा।
- जैतून प्रेस ही प्रिंटिंग प्रेस का मॉडल या आदर्श बना, और साँचे का उपयोग अक्षरों की धातुई आकृतियों को गढ़ने के लिए किया।
- 1448 में यंत्र को मुकम्मल करके उसने पहली किताब बाइबिल छापी। लगभग 180 प्रतियाँ बनाने में उसे 3 साल लगे जो उसे समय के हिसाब से काफ़ी तेज़ था।
➡ शुरू शुरू में तो छपी किताबें भी अपने रंग-रूप और साज-सज्जा में हस्तलिखित पांडुलिपियों जैसे दिखती थीं।
- हाशिये पर फूल-पत्तियों की डिज़ाइन बनाई जाती थी, और चित्र अकसर पेंट किए जाते थे।
- अमीरों के लिए बनाई किताबों में छपे पन्ने पर हाशिये की जगह बेल-बूटों के लिए ख़ाली छोड़ दी जाती थी।
- हर ख़रीदार अपनी रूचि के हिसाब से डिज़ाइन और पेंटर खुद तय करके उसे सँवार सकता था।
करीब 100 सालों के अंदर (1450-1550) यूरोप के ज़्यादातर देशों में छापेख़ाने लग गए थे। छपाईख़ाने की वृद्धि के साथ-साथ पुस्तक उत्पादन में भी बढ़ोतरी हुई। 15वीं सदी के दूसरे हिस्से में 2 करोड़ मुद्रित किताबें आई जो 16वीं सदी में 20 करोड़ हो गई।
मुद्रण क्रांति और उसका असर
छापेख़ाने के आविष्कार ने तकनीकी बदलाव के साथ सूचना और ज्ञान से, संस्था और सत्ता से लोगों का रिश्ता बदल दिया। इससे लोकचेतना और चीज़ों को देखने का नज़रिया बदल गया।
नया पाठक वर्ग
छापेख़ाने से किताबों के उत्पादन में वक़्त और श्रम कम लगने से बड़ी तादाद में प्रतियाँ छपने लगीं। इस कारण किताबों की क़ीमत गिरी और पाठक वर्ग भी बढ़ता गया।
- छपाई क्रांति के पहले किताबें महँगी होने के साथ पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध भी नहीं थी।
- आमलोग मौखिक रूप से धार्मिक किताबों का वाचन, गाथा-गीत, क़िस्से, ज्ञान, और दास्तान आदि सुनते थे।
- अब किताबों तक पहुँच आसान होने से पढ़ने की एक नई संस्कृति विकसित हुई।
- लेकिन यूरोप के अधिकांश देशों में 20वीं सदी तक साक्षरता दर सीमित होने के कारण बोलकर पढ़े गए को ही सुन सकते थे।
- इसलिए मुद्रकों ने लोकगीत और लोककथाएँ छापनी शुरू कर दीं। इन किताबों में खूब सजी-धजी तस्वीरों को छापा जाता था।
- इन्हें सामूहिक ग्रामीण सभाओं में या शहरी शराबघरों में गाया-सुनाया जाता था।
इस तरह मौखिक संस्कृति मुद्रित संस्कृति में दाख़िल हुई और छपी सामग्री मौखिक अंदाज़ में प्रसारित होने से श्रोता और पाठक वर्ग एक-दूसरे में घुल-मिल गए।
धार्मिक विवाद और प्रिंट का डर
छापेख़ाने के ज़रिए सत्ता के विचारों से असहमत लोग अपने विचारों को छाप कर लोगों को अलग ढंग से सोचने या कोई कार्रवाई करने के लिए प्रेरित कर सकते थे।
➡ धर्मगुरुओं और सम्राटों तथा कई लेखकों एवं कलाकारों को छपी किताबों के व्यापक प्रसार और छपे शब्दों की सुगमता से डर था कि इसका लोगों के ज़ेहन पर असर पड़ने से उनमें बाग़ी और अधार्मिक विचार पनपने लगेंगे। ऐसे में मूल्यवान साहित्य की सत्ता नष्ट हो जाएगी।
- धर्म-सुधारक मार्टिन लूथर ने रोमन कैथलिक चर्च की कुरीतियों की आलोचना करते हुए अपनी 95 स्थापनाएँ लिखी।
- इसकी एक छपी प्रति विटेनबर्ग के गिरजाघर के दरवाज़े पर शास्त्रार्थ की चुनौती में टाँगी गई।
- जल्द ही लेख बड़ी तादाद में छापे और पढ़े जाने से चर्च में विभाजन हो गया और प्रोटेस्टेंट धर्मसुधार की शुरुआत हुई।
कई इतिहासकारों ने कहा कि छपाई ने नया बौद्धिक माहौल बनाया और इसमें धर्म-सुधार आंदोलन के नए विचारों के प्रसार में मदद मिली।
मुद्रण और प्रतिरोध
16वीं सदी की इटली के किसान मेनोकियो ने अपने इलाक़े में उपलब्ध किताबों को पढ़ कर बाइबिल के नए अर्थ लगाए।
- उसके ईश्वर और सृष्टि के बारे में विचारों से रोमन कैथलिक चर्च क्रुद्ध हो गया।
- ऐसे धर्म-विरोधी विचारों को दबाने के लिए रोमन चर्च ने इनक्विज़िशन (धर्म-द्रोहियों को दुरुस्त करने वाली संस्था) शुरू किया।
- मेनोकियो को दो बार पकड़ कर आख़िरकार मौत की सज़ा दे दी गई।
- रोमन चर्च ने प्रकाशकों और पुस्तक-विक्रेताओं पर कई तरह की पाबंदियाँ लगाईं, और 1558 ई. से प्रतिबंधित किताबों की सूची रखने लगे।
पढ़ने का जुनून
17वीं और 18वीं सदी के दौरान यूरोप के ज़्यादातर हिस्सों में अलग-अलग संप्रदाय के चर्चों ने गाँवों में स्कूल स्थापित किए और किसानों-कारीगरों को शिक्षित करने लगे। 18वीं सदी के अंत तक कुछ हिस्सों में 60 से 80% साक्षरता दर हो गई थी।
- नए पाठकों की रुचि का ध्यान रखते हुए किस्म-किस्म का साहित्य छपने लगा।
- पुस्तक विक्रेताओं ने गाँव-गाँव जाकर छोटी-छोटी किताबें बेचने वाले फेरीवालों को काम पर लगाया।
- ये किताबें पंचांग के अलावा लोक-कथाएँ और लोकगीतों की होती थीं।
- इंग्लैंड में पेनी चैपबुक्स या एकपैसिया किताबों को गरीब तबके भी खरीदकर पढ़ सकते थे।
- फ़्रांस में बिब्लियोथीक ब्ल्यू का चलन था। जो सस्ते काग़ज़ पर छपी और नीली जिल्द में बँधी छोटी किताबें होती थीं।
- इसके अलावा चार-पाँच पन्ने की प्रेम कहानियाँ और अतीत की थोड़ी गाथाएँ (इतिहास) होती थीं।
- प्राचीन व मध्यकालीन ग्रंथ और नक़्शों के साथ-साथ वैज्ञानिक ख़ाके भी बड़ी मात्रा में छापे गए।
- आइज़ैक न्यूटन (वैज्ञानिक), टॉमस पेन, वॉल्तेयर और ज्याँ ज़ाक रूसो (दार्शनिक) की किताबें भारी मात्रा में छपने और पढ़ी जाने लगीं।
दुनिया के ज़ालिमों, अब हिलोगे तुम !
18वीं सदी के मध्य तक लोगों का विश्वास बन चुका था कि किताबों के ज़रिए प्रगति और ज्ञानोदय होता है। निरंकुशवाद और आतंकी राजसत्ता से समाज को मुक्ति दिलाकर विवेक और बुद्धि का राज बन सकता हैं।
- 18वीं सदी फ़्रांस के एक उपन्यासकार लुई सेबेस्तिएँ मर्सिए ने घोषणा की, “छापाख़ाना प्रगति का सबसे ताक़तवर औज़ार है इससे बन रही जनमत की आँधी में निरंकुशवाद उड़ जाएगा।”
मुद्रण संस्कृति और फ़्रांसीसी क्रांति
कई इतिहासकारों का मानना है कि मुद्रण संस्कृति ने फ़्रांसीसी क्रांति के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ रचीं। इसके मूलतः तीन तरह के तर्क देखने लायक हैं:—
पहला : चिंतकों के लेखन ने परंपरा अंधविश्वास और निरंकुशवाद की आलोचना पेश की। उन्होंने रीति-रिवाजों की जगह तर्क और विवेक के शासन पर बल दिया। वॉल्तेयर और रूसो के पाठक-वर्ग एक नए, आलोचनात्मक, सवालिया और तार्किक नज़रिये से दुनिया को देखने लगे थे।
दूसरा : सारे पुराने मूल्य, संस्थाओं और क़ायदों पर आम जनता के बीच बहस-मुबाहिसे हुए और उनके पुनर्मूल्यांकन का सिलसिला शुरू हुआ। इस तरह बनी “सार्वजनिक दुनिया” से सामाजिक क्रांति के नए विचारों का सूत्रपात हुआ।
तीसरा : 1780 के दशक तक राजशाही और उसकी नैतिकता का मज़ाक उड़ाने वाले साहित्य का ढेर लग चुका था। कार्टूनों और कैरिकेचरों (व्यंग्य चित्रों) में यह भाव उभरता था कि जनता तो मुश्किलों में फँसी है जबकि राजशाही भोग-विलास में डूबी हुई है। इस साहित्य ने लोगों को राजतंत्र के ख़िलाफ़ भड़काया।
उन्नीसवीं सदी
बच्चे, महिलाएँ और मज़दूर
➡ 19वीं सदी के आखिर से प्राथमिक शिक्षा के अनिवार्य होने पर बच्चे, पाठकों की एक अहम श्रेणी बन गए।
- इसलिए फ़्रांस में 1857 में सिर्फ़ बाल-पुस्तकें छापने के लिए एक प्रेस स्थापित कर इसमें पुरानी और नई परी-कथाओं और लोक-कथाओं का प्रकाशन किया गया।
- जर्मनी के ग्रिम बंधुओं ने बरसों लगाकर किसानों के बीच से लोक-कथाएँ जमा कर सामग्री का संपादन हुआ, फिर कहानियों को अंतत: 1812 के एक संकलन में छापा गया।
- अनुपयुक्त सामग्री या अश्लील लगने वाली चीज़ों को संस्करण में शामिल नहीं किया गया।
➡ महिला पाठकों के लिए पेनी मैगज़ींस (एकपैसिया पत्रिकाएँ) होती थीं। 19वीं सदी में उपन्यासों के छपने पर महिलाएँ अहम पाठक बनी।
- मशहूर उपन्यासकार लेखिकाएँ: जेन ऑस्टिन, ब्रॉण्ट बहनें, जॉर्ज इलियट आदि। उनके लेखन से नई नारी की परिभाषा उभरी: जिनका व्यक्तित्व सुदृढ़, गहरी सूझ-बूझ, अपना दिमाग़ और इच्छाशक्ति थी।
➡ 17वीं सदी से ही किराए पर किताब देने वाले पुस्तकालय अस्तित्व में आ गए थे। 19वीं सदी के इंग्लैंड में ऐसे पुस्तकालयों का उपयोग सफ़ेद-कॉलर मज़दूरों, दस्तकारों और निम्नवर्गीय लोगों को शिक्षित करने के लिए किया गया।
- अपने सुधार और आत्मा-अभिव्यक्ति के लिए थोड़ा वक़्त मिलने पर उन्होंने बड़ी संख्या में राजनीतिक पर्चे, और आत्मकथाएँ लिखीं।
नए तकनीकी परिष्कार
- 18वीं सदी के अंत तक प्रेस धातु से बनने लगे थे।
- 19वीं सदी के मध्य तक न्यूयॉर्क के रिचर्ड एम.हो. के शक्ति चालित बेलनाकार प्रेस के ज़रिए प्रति घंटे 8000 शीट छप सकते थे। सदी के अंत तक ऑफ़सेट प्रेस से एक साथ छह रंग की छपाई मुमकिन थी।
- 20वीं सदी के शुरू से बिजली से चलने वाले प्रेस के बल पर छपाई तेज़ी से होने लगी। काग़ज़ डालने की विधि में सुधार हुआ, प्लेट की गुणवत्ता बेहतर हुई, स्वचालित पेपर-रील और रंगों के लिए फ़ोटो-विद्युतीय नियंत्रण भी काम में आने लगे।
➡ 19वीं सदी की पत्रिकाओं द्वारा उपन्यासों को धारावाहिक छापने पर उपन्यास लिखने की एक ख़ास शैली विकसित हुई। इंग्लैंड में 1920 के दशक में लोकप्रिय किताबें एक सस्ती श्रृंखला के तहत छापी गईं। 1930 की आर्थिक मंदी के कारण प्रकाशकों ने किताबों के सस्ते पेपरबैक या अजिल्द संस्करण छापे।
भारत का मुद्रण संसार
मुद्रण युग से पहले की पांडुलिपियाँ
भारत में संस्कृत, अरबी, फ़ारसी और विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं में हस्तलिखित पांडुलिपियों की पुरानी और समृद्ध परंपरा थी। जिसे ताड़ के पत्तों या हाथ से बने काग़ज़ (कभी-कभी बेहतरीन तस्वीरें भी) पर नकल कर बनाई जाती थीं।
- ज़्यादा समय तक बचाए रखने के लिए तख्तियों की जिल्द में या सिलकर बाँध दिया जाता था।
- 19वीं सदी के अंत तक, छपाई के आने के बाद भी, पांडुलिपियाँ छापी जाती रहीं।
- यह नाज़ुक और महँगी होती थीं। उन्हें बड़ी सावधानी से पकड़ना होता था।
- लिपियों के अलग-अलग होने के कारण उन्हें पढ़ना भी आसान नहीं था। इसलिए उनका व्यापक दैनिक इस्तेमाल नहीं होता था।
पूर्व-औपनिवेशिक बंगाल में ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक पाठशालाओं में गुरु याददाश्त से किताबें सुनाते थे, और विद्यार्थी उन्हें लिख लेते थे।
छपाई भारत आई
- 16वीं सदी में प्रिंटिंग प्रेस गोवा में पुर्तगाली धर्म-प्रचारकों के साथ आया।
- जेसुइट पुजारियों ने कोंकणी सीखकर कई सारी पुस्तिकाएँ छापीं।
- 1674 ई. तक कोंकणी और कन्नड़ भाषाओं में लगभग 50 किताबें छप चुकी थीं।
- कैथलिक पुजारियों ने 1579 में कोचीन में पहली तमिल किताब छापी, और 1713 में पहली मलयालम किताब।
- डच प्रोटेस्टेंट धर्म-प्रचारकों ने 32 तमिल किताबें छापीं।
➡ जेम्स ऑगस्टस हिक्की ने 1780 से बंगाल गज़ट नामक साप्ताहिक पत्रिका का संपादन शुरू किया। जो भारत में प्रेस चलाने वाले औपनिवेशिक शासन से आज़ाद, निजी अंग्रेज़ी उद्यम थी। इसमें दासों की बिक्री से जुड़े इश्तेहार भी शामिल थे।
- भारत में कार्यरत वरिष्ठ अंग्रेज़ अधिकारियों से जुड़ी गपबाज़ी भी छपती थी। इससे नाराज़ होकर वॉरेन हेस्टिंग्स (गवर्नर-जनरल) ने हिक्की पर मुक़दमा कर दिया। और ऐसे अखबारों के प्रकाशन को प्रोत्साहित किया जो औपनिवेशिक राज की छवि की रक्षा कर सकें।
कुछ हिंदुस्तानी जैसे: गंगाधर भटटाचार्य द्वारा बंगाल गज़ट अख़बार छापा गया।
धार्मिक सुधार और सार्वजनिक बहसें
19वीं सदी की शुरुआत से ही अलग-अलग समूहों ने औपनिवेशिक समाज में हो रहे बदलावों से अपने-अपने धर्म की व्याख्या पेश कीं।
- कुछ मौजूदा रीति-रिवाजों की आलोचना करते हुए उसमें सुधार चाहते थे।
- कुछ समाज-सुधारकों के तर्कों के ख़िलाफ़ खड़े थे।
- ये सारे वाद-विवाद पुस्तिकाओं और अख़बारों के ज़रिए पब्लिक हो रहे थे।
➡ समाज और धर्म-सुधारकों तथा हिंदू रूढ़िवादियों के बीच विधवा-दाह, एकेश्वरवाद, ब्राह्मण पुजारीवर्ग और मूर्ति-पूजा जैसे मुद्दों को लेकर बहसें पुस्तिकाओं और अख़बारों के ज़रिए तरह-तरह के तर्क समाज के बीच आने लगे।
- 1821ㅡराममोहन रायㅡसंवाद कौमुदी
- 1822ㅡभवानी चरण बन्द्योपाध्यायㅡसमाचार चंद्रिका
- 1882ㅡफ़ारसी अख़बारㅡजाम-ए-जहाँ नामा और शम्सुल अख़बार
➡ उत्तर भारत में उलमा ने मुस्लिम राजवंश के पतन के डर से सस्ते लिथोग्राफ़ी प्रेस का इस्तेमाल करते हुए धर्मग्रंथो के फ़ारसी या उर्दू अनुवाद छापे और धार्मिक अख़बार तथा गुटके निकाले।
- 1867 में देवबंद सेमिनरी ने मुस्लिम पाठकों को रोज़मर्रा का जीवन जीने का सलीका और इस्लामी सिद्धांतों के मायने समझाते हुए हज़ारों फ़तवे जारी किए।
➡ हिंदुओं के बीच स्थानीय भाषाओं में 16वीं सदी की तुलसीदास की किताब रामचरितमानस का पहला मुद्रित संस्करण 1810 में कलकत्ता से प्रकाशित हुआ।
- लखनऊ के नवल किशोर प्रेस और बंबई के श्री वेंकटेश्वर प्रेस में अनेक भारतीय भाषाओं में अनगिनत धार्मिक किताबें छपीं।
प्रकाशन के नए रूप
19वीं सदी के अंत तक दृश्य-संस्कृति भी आकार ले रही थी। छापेखानों के बढ़ने के साथ छवियों की कई नक़लें या प्रतियाँ आसानी से बनने लगी। राजा रवि वर्मा जैसे चित्रकारों ने आम खपत के लिए तसवीरें बनाईं।
- काठ की तख़्ती पर चित्र उकेरने वाले ग़रीब दस्तकारों ने लैटरप्रेस छापेखानों के करीब अपनी दुकानें लगा कर मुद्राकों से काम पाने लगे।
- बाज़ार से सुलभ सस्ती तस्वीरें और कैलेंडर ख़रीदकर ग़रीब भी अपने घरों एवं दफ़्तरों में सजाया करते थे।
- इन छपी तसवीरों ने धीरे-धीरे आधुनिकता और परंपरा, धर्म और राजनीति तथा समाज और संस्कृति के लोकप्रिय विचार-लोक को गढ़ना शुरू कर दिया।
1870 के दशक तक पत्र-पत्रिकाओं में सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर टिप्पणी करते हुए कैरिकेचर और कार्टून के ज़रिए शिक्षित भारतीयों के पश्चिमी पोशाक व अभिरुचियों और राष्ट्रवादियों का मज़ाक उड़ाया गया।
महिलाएँ और मुद्रण
उदारवादी पिता और पति अपने यहाँ औरतों को पढ़ाने लगे, और 19वीं सदी के मध्य शहरों में स्कूल खुलने पर उन्हें स्कूल भेजने लगे। कई पत्रिकाओं ने लेखिकाओं को जगह दी और नारी शिक्षा की ज़रूरत को बार-बार रेखांकित किया।
- उनमें पाठ्यक्रम और ज़रूरत के मुताबिक़ पाठ्य-सामग्री भी छपी। जिसका इस्तेमाल घर बैठे स्कूली शिक्षा के लिए किया जाता था।
- लेकिन अनेक परंपरावादी हिंदू मानते थे कि पढ़ी-लिखी कान्याएँ विधवा हो जाती है। मुसलमानों में उर्दू के रूमानी अफ़साने पढ़कर औरतें बिगड़ जाएँगी।
- लेकिन पूर्वी बंगाल में, कट्टर रूढ़िवादी परिवार में ब्याही रशसुंदरी देबी ने रसोई में छिप-छिप कर पढ़ना सीखा। बाद में आमार जीबन नामक आत्मकथा लिखी, जो 1876 में प्रकाशित हुई।
➡ कैलाशबाशिनी देवी जैसी महिलाओं ने 1860 के दशक से महिलाओं के अनुभवों पर लिखना शुरू किया। महाराष्ट्र में 1880 के दशक में ताराबाई शिंदे और पंडिता रमाबाई ने उच्च जाति की नारियों की दयनीय हालत के बारे में लिखा।
- उर्दू, तमिल, बंगाली और मराठी प्रिंट-संस्कृति पहले विकसित हो गई थी, पर गंभीर हिंदी छपाई की शुरुआत 1870 के दशक से हुई।
- 20वीं सदी के आरंभ में महिलाओं के लिए मुद्रित, और उनके द्वारा संपादित पत्रिकाएँ लोकप्रिय हो गईं। इनमें औरतों की तालीम, विधवा-जीवन, विधवा-विवाह और राष्ट्रीय आंदोलन जैसे मसलों पर लिखा गया।
- कुछ पत्रिकाओं ने महिलाओं को गृहस्थी चलाने और फ़ैशन के नुस्खे बताने के साथ-साथ कहानियों और धारावाहिक उपन्यासों के ज़रिए मनोरंजन कराया।
- राम चड्ढा ने औरतों को आज्ञाकारी बीवियाँ बनने की सीख देने के उद्देश्य से स्त्री धर्म विचार लिखी। खालसा ट्रैक्ट सोसायटी ने इसी तरह के संदेश देते हुए सस्ती पुस्तिकाएँ छापीं।
- बंगाल में कलकत्ता में बटाला इलाक़े में धार्मिक गुटकों और ग्रंथों के सस्ते संस्करण मिलते थे। फेरीवाले इनको लेकर घर-घर घूमते थे, जिससे महिलाओं को फ़ुर्सत के वक़्त मनपसंद किताबें पढ़ने में सहूलियत हो गई।
प्रिंट और ग़रीब जनता
19वीं सदी के मद्रासी शहरों में सस्ती किताबें चौक-चौराहों पर मिलने से ग़रीब लोग भी खरीद सकते थे। 20वीं सदी के आरंभ से सार्वजनिक पुस्तकालय शहरों या क़स्बों या यदा-कदा संपन्न गाँवों में भी खुलने लगे। जिससे किताबों की पहुँच बढ़ी।
➡ 19वीं सदी के अंत से जाति-भेद के बारे में तरह-तरह की पुस्तिकाओं और निबंधों में लिखा जाने लगा था।
- ज्योतिबा फुले ने अपनी गुलामगिरी (1871) में जाति प्रथा अत्याचारों पर लिखा।
- 20वीं सदी के महाराष्ट्र में भीमराव अंबेडकर और मद्रास में ई.वी. रामास्वामी नायकर (पेरियार) ने जाति-भेद पर लिखा।
➡ स्थानीय विरोध आंदोलनों और संप्रदायों ने भी प्राचीन धर्मग्रंथो की आलोचना करते हुए, नए और न्यायपूर्ण समाज को बनाने के लिए लोकप्रिय पत्र-पत्रिकाएँ और गुटके छापे।
- कानपुर के मिल-मज़दूर काशीबाबा ने 1938 में छोटे और बड़े सवाल लिख और छाप कर जातीय तथा वर्गीय शोषण के बारे में बताया।
- 1935 से 1955 के बीच “सुदर्शन चक्र” एक मिल-मज़दूर का लेखन सच्ची कविताएँ नामक एक संग्रह में छापा गया।
- बंगलौर के सूती-मिल-मज़दूरों ने खुद को शिक्षित करने के लिए पुस्तकालय बनाए, जिसकी प्रेरणा उन्हें बंबई के मिल-मज़दूरों से मिली थी।
प्रिंट और प्रतिबंध
सबसे पहले ईस्ट इंडिया कंपनी ने सेंसरशिप उन अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ लगाए जो कंपनी के कुप्रशासन और हुक्मरानों के काम की आलोचना कर रहे थे।
- कलकत्ता सर्वोच्च न्यायालय ने 1820 के दशक तक प्रेस की आज़ादी को नियंत्रित करने के कुछ कानून पास किए।
- कंपनी ने ब्रितानी शासन का उत्सव मनाने वाले अख़बारों के प्रकाशन को प्रोत्साहन दिया।
➡ अंग्रेज़ी और देशी भाषाओं के अख़बार-संपादकों द्वारा गुहार लगाने पर 1835 में गवर्नर जनरल बेंटिंक ने प्रेस क़ानून की पुनर्सामीक्षा की।
- टॉमस मेकॉले ने पहले की आज़ादियों को बहाल करते हुए नए क़ानून बनाए।
- लेकिन 1857 के बाद आइरिश प्रेस कानून के तर्ज़ पर 1878 में वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट के ज़रिए सरकार को भाषाई प्रेस में छपी रपट और संपादकीय को सेंसर करने का व्यापक हक़ मिल गया।
➡ दमन की नीति के बावजूद राष्ट्रवादी अख़बार देश के हर कोने में बढ़ते-फैलते गए। उन्होंने औपनिवेशिक कुशासन की रिपोर्टिंग और राष्ट्रवादी ताकतों का हौसला बढ़ाते रहे।
- पंजाब के क्रांतिकारियों को 1907 में काला पानी भेजने पर बाल गंगाधर तिलक ने अपने केसरी में उनके प्रति गहरी हमदर्दी जताने पर 1908 में उन्हें क़ैद कर लिया गया जिस कारण भारत-भर में व्यापक विरोध हुए।
Class 10 History Chapter 5 Notes In Hindi PDF Download
इसे भी पढ़े
खण्ड Ⅰ : घटनाएँ और प्रक्रियाएँ
अध्याय 1: यूरोप में राष्ट्रवाद का उदय
अध्याय 2: भारत में राष्ट्रवाद
खण्ड Ⅱ : जीविका, अर्थव्यवस्था एवं समाज
अध्याय 3: भूमंडलीकृत विश्व का बनना
अध्याय 4: औद्योगीकरण का युग
Legal Notice
This is copyrighted content of Study Learning Notes. Only students and individuals can use it. If we find this content on any social media (App, Website, Video, Google Drive, YouTube, Facebook, Telegram Channels, etc.) we can send a legal notice and ask for compensation. If you find this content anywhere else in any format, mail us at historynotes360@gmail.com. We will take strict legal action against them.